कुछ परिस्थितियों में व्यय या भुगतान का कटौती योग्य न होना
52[कुछ परिस्थितियों में व्यय या भुगतान का कटौती योग्य न होना
5340क. (1) "कारबार या वृति के लाभ और अभिलाभ" शीर्ष के अधीन आय की संगणना करने से संबंधित इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में इसके प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी इस धारा के उपबंध प्रभावी होंगे।
54(2) (क) जहां निर्धारिती कोर्इ ऐसा व्यय उपगत करता है जिसकी बाबत इस उपधारा के खण्ड (ख) में उल्लिखित किसी व्यक्ति55 को भुगतान दिया गया है या दिया जाना है और 56[निर्धारण] अधिकारी की राय है कि ऐसा व्यय उस माल, सेवा या सुविधा के, जिसके लिए उसे भुगतान किया गया है, उचित बाजार मूल्य को ध्यान में रखते हुए निर्धारिती के कारबार या वृति की वैध जरूरतों या उसके द्वारा उससे प्राप्त या होने वाले फायदे से अधिक या अनुचित है, वहां इस प्रकार उसके द्वारा अधिक या अनुचित समझे गए व्यय की कटौती मान्य नहीं होगी :
57[परंतु धारा 92खक में उल्लिखित किसी विनिर्दिष्ट देशी संव्यवहार की बाबत किसी ऐसे व्यय के मद्दे, जो उचित बाजार मूल्य को ध्यान में रखते हुए अत्यधिक या अयुक्तियुक्त है, मोक को नामंजूर नहीं किया जाएगा, यदि ऐसा संव्यवहार धारा 92च के खंड (ii) में यथापरिभाषित असन्निकट कीमत पर है।]
(ख) खण्ड (क) में उल्लिखित व्यक्ति निम्नलिखित हैं, अर्थात् :—
| (i) | जहां निर्धारिती एक व्यष्टि है | निर्धारिती का कोर्इ नातेदार; | |
| (ii) | जहां निर्धारिती कम्पनी, फर्म, संगम या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है | कम्पनी का कोर्इ निदेशक, फर्म का कोर्इ भागीदार, संगम या कुटुम्ब का कोर्इ सदस्य अथवा ऐसे निदेशक, भागीदार या सदस्य का कोर्इ नातेदार; |
(iii) कोर्इ व्यक्ति जो निर्धारिती के कारबार या वृति में पर्याप्त हित रखता है, या ऐसे व्यक्ति का कोर्इ नातेदार;
(iv) निर्धारिती के कारबार या वृति में पर्याप्त हित रखने वाली कम्पनी, फर्म, व्यक्ति संगम, या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब या ऐसी कम्पनी, फर्म, व्यक्ति संगम या कुटुम्ब का कोर्इ निदेशक, भागीदार या सदस्य अथवा ऐसे निदेशक, भागीदार या सदस्य का कोर्इ नातेदार 57क[अथवा कारबार या वृति में लगी हुर्इ ऐसी कोर्इ अन्य कंपनी, जिसमें प्रथम वर्णित कंपनी का पर्याप्त हित है];
(v) ऐसी कम्पनी, फर्म, व्यक्तियों के संगम या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब, जिसके, यथास्थिति, निदेशक, भागीदार या सदस्य का निर्धारिती के कारबार या वृत्ति में पर्याप्त हित है अथवा ऐसी कम्पनी, फर्म, संगम या कुटुम्ब का कोर्इ निदेशक, भागीदार या सदस्य अथवा ऐसे निदेशक, भागीदार या सदस्य का कोर्इ नातेदार;
(vi) कोर्इ ऐसा व्यक्ति जो कारबार या वृत्ति चलाता है,—
(अ) जहां निर्धारिती का, जो व्यष्टि है या ऐसे निर्धारिती के किसी नातेदार का, उस व्यक्ति के कारबार या वृत्ति में पर्याप्त हित है; या
(आ) जहां निर्धारिती का, जो कम्पनी, फर्म, व्यक्तियों का संगम, या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है अथवा ऐसी कम्पनी के किसी निदेशक, ऐसी फर्म के किसी भागीदार, या ऐसे संगम या कुटुम्ब के किसी सदस्य का, अथवा, ऐसे निदेशक, भागीदार या सदस्य के किसी नातेदार का, उस व्यक्ति के कारबार या वृत्ति में पर्याप्त हित है।
स्पष्टीकरण.-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए किसी व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि उसका किसी कारबार या वृत्ति में पर्याप्त हित है, यदि,—
(क) ऐसी दशा में, जहां वह कारबार या वृत्ति किसी कम्पनी द्वारा चलार्इ जाती है, ऐसा व्यक्ति पूर्ववर्ष के दौरान किसी भी समय, ऐसे शेयरों का जो (लाभांश की नियत दर के हकदार शेयर न होते हुए चाहे वे लाभों में भाग लेने के अधिकार के सहित या उससे रहित हों) कम से कम बीस प्रतिशत मतदान शक्ति रखने वाले हैं, हिताधिकारी स्वामी है; और
(ख) किसी अन्य दशा में, ऐसा व्यक्ति पूर्ववर्ष के दौरान किसी भी समय, ऐसे कारबार या वृत्ति के लाभों के कम से कम बीस प्रतिशत के हिताधिकारी रूप में हकदार है।
58[59(3) जहां निर्धारिती कोर्इ ऐसा व्यय उपगत करता है जिसकी बाबत किसी व्यक्ति को एक दिन में किया गया संदाय या कुल संदाय जो बैंक पर लिखे पाने वाले के खाते में देय चैक या पाने वाले के खाते में देय बैंक ड्राफ्ट से भिन्न रूप में किया जाता है, बीस हजार रुपये से अधिक हो जाता है, वहां ऐसे व्यय 60 की बाबत कोर्इ कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी।
(3क) जहां निर्धारिती द्वारा किसी व्यय के लिए उपगत किसी दायित्व की बाबत किसी वर्ष के निर्धारण में मोक अनुज्ञात किया गया है और बाद में किसी पूर्ववर्ष के दौरान (जिसे इसमें इसके पश्चात् पश्चात्वर्ती वर्ष कहा गया है) निर्धारिती उसकी बाबत संदाय, जो बैंक पर लिखे पाने वाले के खाते में देय चैक से या पाने वाले के खाते में देय बैंक ड्राफ्ट से भिन्न रूप में किया जाता है, करता है, वहां इस प्रकार किया गया संदाय कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ समझे जाएंगे और यदि किसी दिन व्यक्ति को किया गया संदाय या कुल संदाय बीस हजार रुपये से अधिक हो जाता है तो वह तद्नुसार पश्चात्वर्ती वर्ष की आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होगा :
परंतु जहां किसी दिन किसी व्यक्ति को बैंक पर लिखे पाने वाले के खाते में देय चैक या पाने वाले के खाते में देय बैंक ड्राफ्ट से भिन्न रूप में किया गया कोर्इ संदाय या कुल संदाय बीस हजार रुपये से अधिक हो जाता है वहां ऐसे मामलों में और ऐसी परिस्थितियों के अधीन, जो विहित की जाएं,61 उपलब्ध बैंककारी सेवाओं की प्रकृति और सीमा, कारबार की समीचीनता के परिणामों तथा अन्य सुसंगत कारकों को ध्यान में रखते हुए कोर्इ अन्य अमोक नहीं दिया जाएगा और किसी भी संदाय को उपधारा (3) तथा इस उपधारा के अधीन कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ नहीं समझा जाएगा :
62[परंतु यह और कि माल वाहनों को चलाने, भाड़े पर देने या पट्टे पर देने के लिए किए गए संदाय की दशा में उपधारा (3) और उपधारा (3क) के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो "बीस हजार रुपए" शब्दों के स्थान पर "पैंतीस हजार रुपए" शब्द रखे गए हों।]
63-70[(4) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी संविदा में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी व्यय की बाबत कोर्इ संदाय 71[किसी बैंक पर लिखे गए अकाउन्ट पेयी चैक द्वारा या अकाउन्ट पेयी बैंक ड्राफ्ट] द्वारा इसलिए किया जाना हो कि वह उपधारा (3) के अधीन कटौती के रूप में अननुज्ञात किया जा सके, वहां वह संदाय ऐसे चैक या ड्राफ्ट द्वारा किया जा सकेगा; और जहां भुगतान ऐसे किया जाता है या प्रस्तुत किया जाता है वहां किसी व्यक्ति को किसी वाद या अन्य कार्यवाही में इस आधार पर अभिवचन न करने दिया जाएगा कि संदाय नकद रूप में या किसी अन्य रीति से नहीं किया गया था या प्रस्तुत नहीं किया गया था।]
(5) 72[प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया। मूल उपधारा (5), वित्त (सं. 2) अधिनियम,1971 द्वारा 1.4.1972 से अन्त:स्थापित की गर्इ थी।]
(6) 73[प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया। मूल उपधारा (6), वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1972 से अंत:स्थापित की गर्इ थी।]
74[75(7) (क) खंड (ख) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, निर्धारिती द्वारा अपने कर्मचारियों को उनकी सेवानिवृत्ति पर या किसी कारणवश उनके नियोजन की समाप्ति पर उपदान के संदाय के लिए किए गए किसी उपबन्ध76 की बाबत (चाहे इस नाम से या किसी और नाम से ज्ञात हो) कोर्इ कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी।
(ख) खंड (क) की कोर्इ बात निर्धारिती द्वारा अनुमोदित उपदान निधि के मद्दे किसी अंशदान के रूप में किसी राशि के संदाय के प्रयोजनार्थ या किसी उपदान के संदाय के प्रयोजनार्थ, जो पूर्ववर्ष के दौरान संदेय हो गर्इ है,77 की गर्इ किसी व्यवस्था के संबंध में लागू नहीं होगी।
स्पष्टीकरण.-शंकाओं को दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि जहां निर्धारिती द्वारा अपने कर्मचारियों को उनके सेवानिवृत्ति होने पर या किसी कारणवश उनके नियोजन के पर्यवसान पर उपदान के संदाय के लिए की गर्इ किसी व्यवस्था को किसी निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारिती की आय की संगणना करने में कटौती के रूप में अनुज्ञात किया गया है वहां ऐसी व्यवस्था में से अनुमोदित उपदान निधि के संबंध में उपदान के रूप में संदत्त कोर्इ राशि, उस पूर्ववर्ष के, जिसमें ऐसी राशि इस प्रकार संदत्त की जाती है, निर्धारिती की आय की संगणना करने में कटौती के रूप में अनुज्ञात नहीं की जाएगी।
(8) 78[***]
79[(9) निर्धारिती द्वारा नियोजक के रूप में किसी प्रयोजन के लिए किसी निधि, न्यास, कंपनी, व्यक्ति-संगम, व्यष्टि-निकाय, सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी या अन्य संस्था की स्थापना के लिए या उसके बनाने के लिए या उसमें अभिदाय के रूप में संदत्त किसी राशि की बाबत कोर्इ कटौती तभी अनुज्ञात की जाएगी जब ऐसी राशि धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (iv) 79क[या खंड (ivक)] या खंड (v) द्वारा या उसके अधीन उपबंधित अथवा उस समय लागू किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन अपेक्षित प्रयोजनों के लिए और उस तक इस प्रकार अदा की जाती है।
(10) उपधारा (9) में किसी बात के होते हुए भी, जहां 80[निर्धारण] अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि उस उपधारा में निर्दिष्ट निधि, न्यास, कम्पनी, व्यक्ति-संगम, व्यष्टि-निकाय, सोसाइटी या अन्य संस्था ने 1 मार्च, 1984 के पूर्व उस उपधारा में निर्दिष्ट राशि में से कोर्इ व्यय पूर्णत: और भागत: उस उपधारा (9) में निर्दिष्ट निर्धारिती के कर्मचारियों के कल्याण के लिए सद्भावपूर्वक किया है या किया गया है (जो पूंजीगत व्यय के प्रकार का व्यय नहीं है) वहां ऐसे व्यय की रकम को, उस दशा में जिसमें निर्धारिती को ऐसी राशि के बारे में कोर्इ कटौती अनुज्ञात नहीं की गर्इ है तथा इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, उस पूर्ववर्ष से जिसमें ऐसा व्यय इस प्रकार उपगत किया गया है, निर्धारिती की धारा 28 में निर्दिष्ट आय की संगणना करने में कटौती की जाएगी मानो व्यय निर्धारिती द्वारा उपगत, या किया गया व्यय हो।]
81[(11) जहां निर्धारिती ने 1 मार्च, 1984 के पूर्व उपधारा (9) में निर्दिष्ट किसी निधि, न्यास, कंपनी, व्यक्ति, व्यक्ति-संगम, व्यष्टि-निकाय, सोसाइटी या अन्य संस्था को कोर्इ राशि संदत्त की है, वहां किसी अन्य विधि या किसी लिखत में किसी बात के होते हुए भी, वह—
(i) यह दावा करने का हकदार होगा कि उसे उतनी रकम का, जो ऐसी निधि, न्यास, कंपनी, व्यक्ति-संगम, व्यष्टि-निकाय, सोसाइटी या अन्य संस्था द्वारा उपगत या व्यय नहीं की गर्इ है (ऐसी रकम को इसमें इसके पश्चात् अप्रयुक्त रकम कहा गया है), लौटार्इ जाये और जहां इस प्रकार दावा किया जाता है वहां अप्रयुक्त रकम यथाशीघ्र उसे लौटार्इ जाएगी;
(ii) यह दावा करने का हकदार होगा कि ऐसी आस्ति, जो भूमि, भवन, मशीनरी, संयंत्र, या फर्नीचर है, और जो निर्धारिती द्वारा संदत्त राशि से निधि, न्यास, कंपनी, व्यक्ति-संगम, व्यष्टि-निकाय, सोसाइटी या अन्य संस्था द्वारा अर्जित या सन्निर्मित है, उसे अन्तरित कर दी जाए, और जहां इस प्रकार दावा किया जाता है वहां ऐसी आस्ति यथाशीघ्र उसे अन्तरित कर दी जाएगी।]
(12) 82[वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से लोप किया गया।]
52. वित्त अधिनियम, 1968 द्वारा 1.4.1968 से अंत:स्थापित।
53. यह भी देखिये वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किया गया प्रेस नोट, तारीख 2.5.1969, परिपत्र सं. 34, तारीख 5.3.1970, परिपत्र सं. 33, तारीख 29.12.1969, परिपत्र सं. 250, तारीख 11.1.1979, परिपत्र सं. 522, तारीख 18.8.1988, पत्र [फा.सं. 142(14)/70-टीपीएल], तारीख 28.9.1970, पत्र [फा.सं. 1(22)/69-टीपीएल (पी.टी.)], तारीख 18.4.1969, परिपत्र सं. 220, तारीख 31.5.1977, परिपत्र सं. 169 (पैरा 27), तारीख 23.6.1975, पत्र [फा.सं. 204/10/71-आर्इ.टी. (ए-II)], तारीख 17.4.1971 और आय-कर आयुक्त्त, मुंबर्इ का पत्र बी सी सं. टी-II/256-प्रकीर्ण, 75-76, तारीख 15.11.1975.
54. सुसंगत केस लॉज़ देखिये।
55. 'किसी व्यक्ति' पद के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिये।
56. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
57. वित्त अधिनियम, 2012 द्वारा 1.4.2013 से अंत:स्थापित। इससे पूर्व विद्यमान परन्तुक वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1972 से संशोधित किया गया था और बाद में प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से इसका लोप किया गया था।
57क. वित्त अधिनियम, 2012 द्वारा 1.4.2013 से अंत:स्थापित।
58. वित्त अधिनियम, 2008 द्वारा 1.4.2009 से उपधारा (3) के स्थान पर उपधारा (3) और (3क) प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988/1.4.1989 से, वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.4.1996 से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा 13.7.2006 से और वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.4.2008 से यथासंशोधित उपधारा (3) इस प्रकार थी :
"(3)(क) जहां निर्धारिती कोर्इ ऐसा व्यय उपगत करता है जिसकी बाबत बीस हजार रुपए से अधिक की राशि का कोर्इ संदाय बैंक पर पाने वाले के खाते में देय (account payee) चैक या पाने वाले के खाते में देय बैंक ड्राफ्ट से भिन्न किसी अन्य रीति से किया जाता है, वहां ऐसे व्यय की बाबत कोर्इ कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी।
(ख) जहां किसी व्यय के संबंध में निर्धारिती द्वारा उपगत किसी दायित्व की बाबत कोर्इ मोक किसी वर्ष के निर्धारण में अनुज्ञात किया गया है और तत्पश्चात् किसी पूर्ववर्ष के दौरान (जिसे इसमें इसके पश्चात् पश्चात्वर्ती वर्ष कहा गया है) निर्धारिती उसकी बाबत संदाय बैंक पर पाने वाले के खाते में देय चैक से या पाने वाले के खाते में देय बैंक ड्राफ्ट से किए जाने के बजाय अन्य रीति में करता है वहां इस प्रकार किया गया संदाय कारबार या वृत्ति का लाभ और अभिलाभ समझा जाएगा तथा यदि संदाय की रकम बीस हजार रुपए से अधिक है, तो तदनुसार पश्चात्वर्ती वर्ष की आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होगा :
परन्तु जहां बीस हजार रुपए से अधिक का कोर्इ संदाय बैंक पर पाने वाले के खाते में देय चैक या पाने वाले के खाते में देय बैंक ड्राफ्ट से भिन्न किसी रीति में किया जाता है वहां ऐसे मामलों और ऐसी परिस्थितियों के अधीन, जो विहित की जाएं, उपलब्ध बैंककारी सुविधाओं की प्रकृति और सीमा तथा कारबार की समीचीनता तथा अन्य सुसंगत कारकों को ध्यान में रखते हुए कोर्इ भी अमोक नहीं दिया जाएगा और कोर्इ भी संदाय इस उपधारा के अधीन कारबार या वृत्ति का लाभ और अभिलाभ नहीं माना जाएगा।"
59. परिपत्र सं. 522, तारीख 18.8.1988, परिपत्र सं. 4/2006 तारीख 29.3.2006, परिपत्र सं. 8/2006, तारीख 6.10.2006 और परिपत्र सं. 10/2008, तारीख 5.12.2008 भी देखिए। ब्यौरे के लिए सुसंगत केस लाज़ देखिए।
60. "व्यय" पद की परिभाषा के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिए।
61. उन मामलों और परिस्थितियों के लिए नियम 6घघ देखिए, जिनमें 20,000 रुपए से अधिक की राशि का संदाय किसी बैंक के नाम लिखे पाने वाले के खाते में देय या पाने वाले के खाते में देय, ड्राफ्ट से भिन्न रूप में किया जा सकेगा।
62. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा 1.10.2009 से अंत:स्थापित।
63-70. वित्त अधिनियम, 1969 द्वारा 1.4.1969 से अंत:स्थापित।
71. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा 13.7.2006 से "बैंक पर लिखे गए क्रास चैक द्वारा या क्रास बैंक ड्राफ्ट द्वारा" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
72. लोप से पहले उपधारा (5), प्रत्यक्ष कर (संशोधन) अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1974 से, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से, वित्त अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से और वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1985 से संशोधित की गर्इ थी।
73. लोप से पहले उपधारा (6), वित्त अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से संशोधित की गर्इ थी।
74. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, वित्त अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1973 से भूतलक्षी प्रभाव से अन्त:स्थापित उपधारा (7) निम्न प्रकार थी :
'(7) (क) खण्ड (ख) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, निर्धारिती द्वारा अपने कर्मचारियों को उनके सेवानिवृत्त होने पर या किसी कारणवश उनके नियोजन के पर्यवसान पर उपदान के संदाय के लिए की गर्इ किसी व्यवस्था (चाहे उसे यही या कोर्इ और नाम दिया जाए) की बाबत कोर्इ कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी;
(ख) खण्ड (क) की कोर्इ बात—
(i) किसी अनुमोदित उपदान निधि में अभिदाय के रूप में उस पूर्ववर्ष के दौरान संदेय किसी राशि के संदाय के प्रयोजन के लिए या उस पूर्ववर्ष के दौरान संदेय हो गए किसी उपदान के संदाय के प्रयोजन के लिए निर्धारिती द्वारा की गर्इ किसी व्यवस्था के संबंध में लागू नहीं होगी;
(ii) 1973 के अप्रैल के प्रथम दिन को या उसके पश्चात् किंतु 1976 के अप्रैल के प्रथम दिन के पूर्व प्रारम्भ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए निर्धारिती द्वारा की गर्इ व्यवस्था को उस विस्तार तक लागू नहीं होगी जिस तक ऐसी व्यवस्था की रकम अनुज्ञेय रकम से अधिक नहीं है, यदि निम्नलिखित शर्तें पूरी की जाती हैं, अर्थात् :—
(1) वह व्यवस्था निर्धारिती के कर्मचारियों को उनके सेवानिवृत्त होने पर या किसी कारणवश उनके नियोजन के पर्यवसान पर उपदान के संदाय के लिए निर्धारिती के अभिनिश्चित किए जा सकने वाले दायित्व के बीमांकन मूल्यांकन के अनुसार की गर्इ है;
(2) निर्धारिती अप्रतिसंहरणीय न्यास के अधीन अपने कर्मचारियों के अनन्य फायदे के लिए अनुमोदित उपदान निधि का सृजन करता है और ऐसी निधि के अनुमोदन के लिए आवेदन 1976 की जनवरी के प्रथम दिन के पूर्व किया गया है; और
(3) अनुज्ञेय रकम कम से कम पचास प्रतिशत के बराबर राशि या जहां ऐसी व्यवस्था में से किसी रकम का उपयोग अनुमोदित उपदान निधि के सृजन से पहले उपदान के संदाय के प्रयोजन के लिए किया गया है वहां इस प्रकार उपयोजित रकम घटा कर अनुज्ञेय रकम के कम से कम पचास प्रतिशत के बराबर राशि निर्धारिती द्वारा 1976 के अप्रैल के प्रथम दिन के पहले अनुमोदित उपदान निधि के अभिदाय के रूप में संदत्त की जाती है और यथास्थिति, अनुज्ञेय रकम का अतिशेष या इस प्रकार उपयोजित रकम घटाकर अनुज्ञेय रकम का अतिशेष निर्धारिती द्वारा ऐसे अभिदाय के रूप में 1977 के अप्रैल के प्रथम दिन के पहले संदत्त किया जाता है।
स्पष्टीकरण 1.-इस उपधारा के खण्ड (ख) के उपखंड (ii) के प्रयोजनों के लिए "अनुज्ञेय रकम" से अभिप्रेत है निर्धारिती द्वारा अपने कर्मचारियों को उनके सेवानिवृत्त होने पर या किसी कारणवश उनके नियोजन के पर्यवसान पर उपदान के संदाय के लिए सृजित व्यवस्था की रकम उस सीमा तक जहां ऐसी रकम ऐसे उपदान के संदाय के लिए हकदार प्रत्येक कर्मचारी के उसकी सेवा के जिसकी बाबत ऐसी व्यवस्था की गर्इ है, प्रत्येक वर्ष के लिए वेतन के [चतुर्थ अनुसूची के भाग क के नियम 2 के खण्ड (ज) में यथापरिभाषित] 81/3 प्रतिशत की दर से परिकलित रकम से अधिक नहीं है।
स्पष्टीकरण 2.-शंकाओं के निराकरण के लिए यह घोषित किया जाता है कि जहां निर्धारिती द्वारा अपने कर्मचारियों को उनके सेवानिवृत्त होने पर या किसी कारणवश उनके नियोजन के पर्यवसान पर उपदान के संदाय के लिए किसी व्यवस्था को किसी निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारिती की आय की संगणना में कटौती के रूप में अनुज्ञात किया गया है वहां ऐसी व्यवस्था में से अनुमोदित उपदान निधि में अभिदाय के रूप में या किसी कर्मचारी को उपदान के रूप में संदत्त राशि, उस पूर्ववर्ष में जिसमें ऐसी राशि इस प्रकार संदत्त की जाती है निर्धारिती की आय की संगणना करने में कटौती के रूप में अनुज्ञात नहीं की जाएगी।'
75. सुसंगत केस लॉज़ देखिये।
76. "उपबन्ध" पद के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिये।
77. "जो उस पूर्ववर्ष के दौरान संदेय हो गर्इ है" पद के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिये।
78. वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1986 से उपधारा (8) का लोप किया गया। लोप से पहले, उपधारा (8) वित्त अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित की गर्इ थी।
79. वित्त अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1980 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।
79क. वित्त अधिनियम, 2011 द्वारा 1.4.2012 से अंत:स्थापित।
80. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
81. वित्त अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1980 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।
82. लोप किए जाने से पहले उपधारा (12) वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1986 से अंत:स्थापित की गर्इ थी।
[वित्त अधिनियम, 2016 द्वारा संशोधित रूप में]

