परिशिष्ट
आय-कर नियमों में उल्लिखित सहबद्ध विधियों के उपबंधों का पाठ
काफी अधिनियम, 1942 की धारा 3(घ)
परिभाषाएं
3. (1) इस अधिनियम में जब तक कि कोर्इ बात विषय या संदर्भ के विरुद्ध न हो,–
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(घ) "संसाधन" से विपणन के लिए काफी को तैयार करने के प्रयोजनार्थ, गूदा निकालने से भिन्न यांत्रिक प्रक्रियाओं का कच्ची काफी पर प्रयोग किया जाना अभिप्रेत है;
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 4क
लोक वित्तीय संस्थाएं
4क. (1) इस उपधारा में विनिर्दिष्ट प्रत्येक वित्तीय संस्था इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए लोक वित्तीय संस्था समझी जाएगी, अर्थात् :--
(i) इंडस्ट्रियल क्रेडिट एण्ड इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड जो भारतीय कंपनी अधिनियम, 1913 (1913 का 7) के अधीन बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत कंपनी है;
(ii) औद्योगिक वित्त निगम अधिनियम, 1948 (1948 का 15) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय औद्योगिक वित्त निगम;
(iii) भारतीय औद्योगिक विकास बैंक अधिनियम, 1964 (1964 का 18) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय औद्योगिक विकास बैंक;
(iv) जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय जीवन बीमा निगम;
(v) भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय यूनिट ट्रस्ट;
(vi) इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनेन्स कंपनी लिमिटेड जो इस अधिनियम के अधीन बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत कंपनी है;
(vii) [प्रतिभूति हित का प्रवर्तन और ऋण वसूली विविध (संशोधन) अधिनियम, 2004 द्वारा 11.11.2004 से, भूतलक्षी प्रभाव से, लोप किया गया।]
(2) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अन्य ऐसी संस्थाओं को विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिन्हें वह लोक वित्तीय संस्था होने के लिए ठीक समझे :
परन्तु कोर्इ संस्था इस प्रकार तभी विनिर्दिष्ट की जाएगी जब--
(i) वह किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या उस के अधीन स्थापित या गठित की गर्इ हो, या
(ii) उस संस्था की समादत्त शेयर पूंजी का कम से कम 51 प्रतिशत केन्द्रीय सरकार द्वारा धृत या नियंत्रित हो।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25
पूर्त या अन्य कंपनी के नाम में ''लिमिटेड'' शब्द जोड़ने से अभिमुक्ति देने की शक्ति
25. (1) जहां कि केन्द्रीय सरकार को समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है कि कोर्इ संगम--
(क) परिसीमित कंपनी के रूप में वाणिज्य, कला, विज्ञान, धर्म, पूर्त या किसी अन्य उपयोगी उद्देश्य के लिए काम करने के लिए बनाया ही जाने वाला है, तथा
(ख) अपने लाभों को, यदि कोर्इ हों, या अन्य आय को अपने उद्देश्यों के लिए काम करने में लगाने का आशय रखती है तथा इस बात का उस पर प्रतिषेध है कि वह अपने सदस्यों को कोर्इ लाभांश दे,
वहां केन्द्रीय सरकार अनुज्ञप्ति के जरिए यह निर्देश दे सकेगी कि वह परिसीमित दायित्व वाली कंपनी के रूप में उसके नाम में ''लिमिटेड'' शब्द का ''प्राइवेट लिमिटेड'' शब्द जोड़े बिना रजिस्ट्रीकृत कर ली जाए।
(2) तदुपरि यह संगम तदनुसार रजिस्ट्रीकृत किया जा सकेगा तथा रजिस्ट्रीकरण होने पर वह परिसीमित कंपनियों के सभी विशेषाधिकारों का उपभोग करेगा तथा (इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए) उनकी सभी बाध्यताओं के अधीन रहेगा।
(3) जहां कि केन्द्रीय सरकार को समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है--
(क) कि किसी ऐसी कंपनी के उद्देश्य, जो इस अधिनियम के अधीन परिसीमित कंपनी के रूप में रजिस्ट्रीकृत की गर्इ है उपधारा (1) के खंड (क) में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों तक परिसीमित हैं, तथा
(ख) कि अपने गठन में कंपनी से यह बात अपेक्षित है कि वह अपने लाभों को, यदि कोर्इ हों, या अन्य आय को अपने उद्देश्यों के लिए, काम करने में लगाए तथा उस पर यह प्रतिषेध है कि वह अपने सदस्यों को कोर्इ भी लाभांश न दे,
वहां केन्द्रीय सरकार अनुज्ञप्ति के जरिए कंपनी को प्राधिकृत कर सकेगी कि अपने विशेष संकल्प द्वारा वह अपने नाम को तब्दील कर ले जिसके अंतर्गत अपने नाम में ''लिमिटेड'' शब्द को या ''प्राइवेट लिमिटेड'' शब्दों का जोड़ना या लुप्त कर देना आता है; तथा इस उपधारा के अधीन नाम तब्दील कर लेने के बारे में धारा 23 उसी प्रकार लागू होगी जैसे वह धारा 21 के अधीन नाम तब्दील करने को लागू होती है।
(4) कोर्इ फर्म इस धारा के अधीन अनुज्ञापित संगम या कंपनी का सदस्य हो सकेगी किंतु उस फर्म के विघटन पर उसकी उस संगम या कंपनी की सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
(5) इस धारा के अधीन कोर्इ अनुज्ञप्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी शर्तों पर और ऐसे विनियमों के अधीन रहते हुए, जैसी या जैसे वह ठीक समझती है, अनुदत्त की जा सकेगी तथा वे शर्तें और विनियम उस निकाय पर, जिसे अनुज्ञप्ति अनुदत्त की जाती है, आबद्धकर होंगे तथा जहां कि यह अनुदान उपधारा (1) के अधीन है वहां यदि केन्द्रीय सरकार ऐसा निदेश देती है तो वह ज्ञापन में या अनुच्छेदों में या भागत: पूर्वकथित में और भागत: पश्चात्कथित में अन्त:स्थापित किया जा सकेगा।
(6) किसी निकाय के लिए, जिसे ऐसी अनुज्ञप्ति अनुदत्त की जाती है, यह आवश्यक नहीं होगा कि वह अपने नाम के किसी भाग के रूप में ''लिमिटेड'' शब्द या ''प्राइवेट लिमिटेड'' शब्दों का प्रयोग करे तथा जब तक कि उसके अनुच्छेद अन्यथा उपबंधित नहीं करते हैं, तथा उस दशा में, जिसमें कि केन्द्रीय सरकार ने साधारण या विशेष आदेश द्वारा ऐसा निदेश दिया है उस निदेश में विनिर्दिष्ट विस्तार तक ऐसे निकाय को इस अधिनियम के ऐसे उपबंधों से छूट मिली रहेगी जैसे उसमें विनिर्दिष्ट किए जाएं।
(7) वह अनुज्ञप्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी भी समय प्रतिसंहृत की जा सकेगी, तथा प्रतिसंहरण करने पर रजिस्ट्रार उस नाम के अंत में, जो उस निकाय का, जिसे अनुज्ञप्ति अनुदत्त की गर्इ थी, रजिस्टर में है, ''लिमिटेड'' शब्द या ''प्राइवेट लिमिटेड'' शब्दों को दर्ज कर देगा; तथा ऐसा निकाय इस धारा के अधीन दी गर्इ छूट का उपयोग करने से परिविरत हो जाएगा :
परन्तु केन्द्रीय सरकार इससे पूर्व कि कोर्इ अनुज्ञप्ति ऐसे प्रतिसंहृत की जाए अपने आशय की सूचना उस निकाय को लिखित रूप में देगी तथा ऐसे प्रतिसंहरण के विरुद्ध उसकी सुनवार्इ की जाने का अवसर उस निकाय को देगी।
(8) (क) कोर्इ निकाय, जिसके बारे में इस धारा के अधीन कोर्इ अनुज्ञप्ति प्रवृत्त है, उन उपबंधों में, जो उसके ज्ञापन में उसके उद्देश्यों संबंधी है, कोर्इ परिवर्तन केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना, जो लिखित रूप में संज्ञापित किया जाएगा, न करेगा।
(ख) केन्द्रीय सरकार ऐसे निकाय की अनुज्ञप्ति का प्रतिसंहरण उस दशा में कर सकेगी जिसमें कि वह खण्ड (क) के उपबंधों का उल्लंघन करता है।
(ग) केन्द्रीय सरकार, खंड (क) में निर्दिष्ट अनुमोदन अनुदत्त करते समय, उन शर्तों और विनियमों के, यदि कोर्इ हों, जिनके अधीन वह अनुज्ञप्ति पहले थी, बदले में या अतिरिक्त ऐसी शर्तों तथा विनियमों के अधीन करके, जैसी या जैसे वह सरकार ठीक समझती है, उस अनुज्ञप्ति में फेर बदल कर सकेगी।
(घ) जहां कि किसी निकाय के ज्ञापन के उपबंधों में इस उपधारा के अधीन प्रस्थापित कोर्इ परिवर्तन उस निकाय के उद्देश्यों के बारे में जिस हद तक इस वास्ते अपेक्षित हो कि वह निकाय धारा 17 की उपधारा (1) के खण्ड (क) से (छ) तक में विनिर्दिष्ट किसी बात को करने के लिए समर्थ हो जाए, वहां उस हद तक इस धारा के उपबंध, उस धारा के उपबंधों के अतिरिक्त, न कि उनके अल्पीकरण में, होंगे।
(9) उस अनुज्ञप्ति का प्रतिसंहरण किए जाने पर, जो ऐसे निकाय को, जिसके नाम में ''वाणिज्य मंडल'' शब्द अन्तर्विष्ट है, इस धारा के अधीन अनुदत्त की गर्इ थी, वह निकाय प्रतिसंहरण किए जाने की तारीख से तीन मास के भीतर या ऐसी दीर्घतर कालावधि के भीतर, जैसी केन्द्रीय सरकार अनुज्ञात करना ठीक समझे, अपना नाम ऐसे नाम से बदल सकेगा जिसमें वे शब्द अंतर्विष्ट नहीं हैं, तथा--
(क) उस सूचना में, जो उस निकाय को उपधारा (7) के उपबंधों के अधीन दी जाने वाली है, उस प्रभाव का विवरण दिया होगा जो इस उपधारा के पूर्वगामी उपबंधों का है; तथा
(ख) धारा 23 इस उपधारा के अधीन नाम तब्दील करने को उसी प्रकार लागू होगी जैसे वह धारा 21 के अधीन नाम तब्दील करने को लागू होती है।
(10) यदि कोर्इ निकाय उपधारा (9) की अपेक्षाओं का अनुपालन करने में व्यतिक्रम करता है, तो वह जुर्माने से, जो हर दिन के लिए जिसके दौरान वह व्यतिक्रम चालू रहता है, पांच हजार रुपए तक हो सकेगा, दंडनीय होगा।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 226
संपरीक्षकों की अर्हताएं और अनर्हताएं
226. (1) कोर्इ व्यक्ति कंपनी के संपरीक्षक के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए तब के सिवाय अर्हित न होगा जबकि चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) के अर्थ के अंदर वह चार्टर्ड अकाउंटेंट है :
परन्तु जिस फर्म के भारत में व्यवसाय करने वाले सब भागीदार नियुक्ति के लिए पूर्वोक्त रूप में अर्हित हैं वह कंपनी का संपरीक्षक अपने फर्म के नाम से नियुक्त किया जा सकेगा, और ऐसे व्यवसाय करने वाला कोर्इ भागीदार उस दशा में फर्म के नाम से कार्य कर सकेगा।
(2) (क) उस प्रमाणपत्र का धारक, जो, यथास्थिति, भाग ख राज्य (विधि) अधिनियम, 1951 (1951 का 3) के प्रारम्भ के अव्यवहित पूर्व किसी पूरे भाग ख राज्य या उसके किसी भाग में प्रवृत्त किसी विधि के अथवा जम्मू-कश्मीर (विधि-विस्तारण) अधिनियम, 1956 (1956 का 62) के अधीन उसे इस बात का हकदार करने के लिए दिया गया था कि वह उन राज्यक्षेत्रों में, जो 1956 के नवंबर के प्रथम दिन के अव्यवहित पूर्व उस राज्य में समाविष्ट थे, या उसके भाग में कंपनियों के संपरीक्षक के रूप में कार्य कर सकता है भारत में कहीं भी रजिस्ट्रीकृत कंपनियों के संपरीक्षक के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त किए जाने का हकदार उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किंतु खण्ड (ख) के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए होगा।
(ख) केन्द्रीय सरकार उन राज्यक्षेत्रों में, जो 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन के अव्यवहित पूर्व भाग ख राज्यों में समाविष्ट थे, व्यक्तियों को संपरीक्षक प्रमाणपत्रों के दिए जाने, नवीकरण, निलंबन या रद्द किए जाने के लिए उपबंध खण्ड (क) के प्रयोजनों के लिए नियम तथा ऐसे दिए जाने, नवीकरण, निलंबन या रद्द किए जाने के लिए शर्तें और निर्बन्धन विहित करने वाले नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी।
(3) निम्नलिखित व्यक्तियों में से कोर्इ भी कंपनी के संपरीक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए अर्ह न होगा :--
(क) निगम-निकाय;
(ख) कंपनी का अधिकारी या कर्मचारी;
(ग) कोर्इ भी व्यक्ति, जो कंपनी के अधिकारी या कर्मचारी का भागीदार है या उसके नियोजन में है;
(घ) ऐसा कोर्इ व्यक्ति, जो एक हजार से अधिक रुपए की रकम का कंपनी का ऋणी है, अथवा जिसने एक हजार रुपए से अधिक रकम की किसी पर-व्यक्ति की ऋणता के, जो कंपनी के प्रति उस पर-व्यक्ति की है, संबंध में कोर्इ प्रत्याभूति दी है या कोर्इ प्रतिभूति उपबंधित की है;
(ड़) ऐसा कोर्इ व्यक्ति, जो कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 2000 के प्रारंभ की तारीख से एक वर्ष की अवधि के पश्चात् उस कंपनी की किसी प्रतिभूति का धारक है :
स्पष्टीकरण–इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "प्रतिभूति" से ऐसी कोर्इ लिखत अभिप्रेत है जिसके साथ मतदान का अधिकार है।
स्पष्टीकरण : इस उपधारा में अधिकारी या कर्मचारी के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि उनके अंतर्गत संपरीक्षक के प्रति निर्देश नहीं हैं।
(4) कोर्इ व्यक्ति किसी कंपनी के संपरीक्षक के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए उस दशा में भी अर्हित नहीं होगा जिसमें कि किसी ऐसे निगम निकाय के संपरीक्षक के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए वह उपधारा (3) के आधार पर अनर्ह है जो उस कंपनी की समनुषंगी है या नियंत्री कंपनी है अथवा उस कंपनी की नियंत्री कंपनी की समनुषंगी है, अथवा उस दशा में ऐसे अनर्ह होती जिसमें कि वह निगम निकाय कंपनी होता।
(5) यदि कोर्इ संपरीक्षक अपनी नियुक्ति के पश्चात् उपधारा (3) और (4) में विनिर्दिष्ट अनर्हताओं में से किसी के अधीन हो जाता है तो उसकी बाबत यह समझा जाएगा कि उसने उस रूप में अपना पद रिक्त कर दिया है।
विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 की धारा 2(ग)
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,–
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(ग) "प्राधिकृत व्यक्ति" से ऐसा प्राधिकृत व्यवहारी, मुद्रा परिवर्तक, अपतट बैंककारी इकार्इ या कोर्इ अन्य व्यक्ति अभिप्रेत है जो तत्समय विदेशी मुद्रा या विदेशी प्रतिभूतियों का कारबार करने के लिए धारा 10 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत है;
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आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 2 का खंड (36क)
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा उपेक्षित न हो,–
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(36क) "पब्लिक सेक्टर कंपनी" से अभिप्रेत है किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रांतीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगम या कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथा परिभाषित सरकारी कंपनी;
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आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10 का खंड (23घ) उसका स्पष्टीकरण (क)
(क) "पब्लिक सेक्टर बैेंक" पद से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में परिभाषित समनुषंगी बैंक, बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक अभिप्रेत है;
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बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 2
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में, जब तक कि कोर्इ बात विषय या संदर्भ में विरुद्ध न हो–
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(9) ''बीमाकर्ता'' से निम्नलिखित अभिप्रेत है :–
(क) बीमा कारबार करने वाला कोर्इ व्यष्टि या व्यष्टियों का अनिगमित निकाय या भारत से भिन्न किसी देश की विधि के अधीन निगमित निकाय, जो इस खंड के उपखंड (ग) में विनिर्दिष्ट व्यक्ति न होते हुए :–
(i) भारत में ऐसा कारबार करता है, या
(ii) जिसके कारबार का प्रधान कार्यालय भारत में है या जो भारत में अधिवसित है, या
(iii) बीमा कारबार अभिप्राप्त करने के उद्देश्य से भारत में प्रतिनिधि नियोजित करता है या कारबार का स्थान बनाए रखता है;
(ख) बीमा कारबार करने वाला [किन्तु इस खंड के उपखंड (ग) में विनिर्दिष्ट व्यक्ति से भिन्न] कोर्इ ऐसा निगमित निकाय जो भारत में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन निगमित निकाय है; या जो ऐसे किसी निगमित से इंडियन कंपनीज ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) की धारा 2 की उपधारा (2) में परिभाषित समनुषंगी कंपनी के रूप में उस अधिनियम के अर्थ में सम्बद्ध है, और
(ग) कोर्इ ऐसा व्यक्ति जिसकी ऐसे हामीदारों से, जो सोसायटी ऑफ लायड्स के सदस्य हैं, भारत में स्थायी संविदा है, जिसके द्वारा ऐसा व्यक्ति ऐसी संविदा के निबंधनों के अंतर्गत अन्य व्यक्तियों को हामीदारों की ओर से जोखिम संरक्षण पत्र, जोखिम ग्रहण पत्र या बीमा रक्षण देने वाली अन्य दस्तावेजें देने के लिए प्राधिकृत है,
किंतु इसके अंतर्गत प्रधान अभिकर्ता, मुख्य अभिकर्ता, विशेष अभिकर्ता या बीमा अभिकर्ता या भाग 3 में परिभाषित क्षेमदा सोसाइटी नहीं है।
राष्ट्रीय स्वपरायणता, प्रमस्तिष्क घात, मानसिक मंदता और बहु-नि:शक्तताग्रस्त व्यक्ति कल्याण न्यास अधिनियम, 1999 की धारा 2
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,
(क) "स्वपरायणता" से किसी व्यक्ति के संप्रेषण और सामाजिक योग्यताओं को प्रभावित करने वाली असमान कौशल के विकास की अवस्था अभिप्रेत से और जो आवृतिमय और कर्मकांड व्यवहार से परिलक्षित होती है;
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(ग) "प्रमस्तिष्क घात" से किसी व्यक्ति की अविकासशील अवस्था समूह अभिप्रेत है जो प्रसवपूर्व, प्रसवकालीन या बाल की विकास अवधि में होने वाले प्रमस्तिष्क आघात या क्षति के फलस्वरूप असामान्य प्रेरक नियंत्रण स्थिति द्वारा सुस्पष्ट होती है;
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(छ) "मानसिक मंदता" से किसी व्यक्ति के मस्तिष्क के अवरूद्ध या अपूर्ण विकास की दशा अभिप्रेत है जो विशेषतया बुद्धिमता की अवसामान्यता से सुस्पष्ट होती है;
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(ज) "बहु:निशक्तता" से नि:शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार सरंक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 (1996 का 1) की धारा 2 के खंड (झ) में परिभाषित दो या अधिक नि:शक्तताओं का संयोजन अभिप्रेत है;
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(ञ) "नि:शक्त व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो स्वपरायणता, प्रमस्तिष्क घात, मानसिक मंदता या ऐसी अवस्थाओं में से किन्हीं दो या अधिक अवस्थाओं के संयोजन से संबंधित किसी भी अवस्था से ग्रस्त है और इसमें गंभीर बहु:निशक्तता से ग्रस्त व्यक्ति भी आता है;
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(ण) "गंभीर बहु:निशक्तता" से ऐसी नि:शक्तता अभिप्रेत है जो एक या अधिक बहु:निशक्तताओं का अस्सी प्रतिशत या उससे अधिक है;
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गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी (रिजर्व बैंक) निदेश, 2011 की धारा 3(क), (ग) और (घ)
परिभाषाएं
2. इन निदेशों के प्रयोजन के लिए, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो–
(क) "ग्राही" से ऐसा कोर्इ पक्षकार अभिप्रेत है जिसने अवसंरचना के विकास के लिए परियोजना प्राधिकारी के साथ "रियायत संबंधी करार" नामक कोर्इ करार दिया है;
(ख) ** ** **
(ग) "परियोजना प्राधिकारी" से देश में अवसंरचना के विकास के लिए किसी कानून द्वारा गठित कोर्इ प्राधिकारी अभिप्रेत है;
(घ) "त्रिपक्षीय करार" से तीन पक्षकारों के बीच अर्थात् ग्राही, परियोजना प्राधिकारी और आर्इ.डी.एफ-एन.पी.एफ.सी. के बीच ऐसा करार अभिप्रेत है, जो उसके पक्षकारों को उसमें निर्दिष्ट अन्य करारों के निबंधनों और शर्तों से भी आबद्धकर बनाता है;
पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 2(1)(ख)
परिभाषाएं और निर्वचन
2. (1) ** ** **
(ख) "नियंत्रक" से पेटेंट, डिजाइन और व्यापार चिन्ह महानियंत्रक अभिप्रेत है जो धारा 73 में निर्दिष्ट है;
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नि:शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की धारा 2
परिभाषाएं
2. (1) ** ** **
(क) "समुचित सरकार" से अभिप्रेत है,–
(i) केन्द्रीय सरकार या उस सरकार द्वारा पूर्णत: या पर्याप्त रूप से वित्तपोषित किसी स्थापन या छावनी अधिनियम, 1924 के अधीन गठित किसी छावनी बोर्ड के संबंध में, केन्द्रीय सरकार;
(ii) किसी राज्य सरकार या उस सरकार द्वारा पूर्णत: या पर्याप्त रूप से वित्तपोषित किसी स्थापन या छावनी बोर्ड से भिन्न किसी स्थानीय प्राधिकारी के संबंध में राज्य सरकार;
(iii) केन्द्रीय समन्वय समिति और केन्द्रीय कार्यपालिका समिति की बाबत, केन्द्रीय सरकार; और
(iv) राज्य समन्वय समिति और राज्य कार्यपालिका समिति की बाबत, राज्य सरकार;
(ख) "अंधता" उस अवस्था को निर्दिष्ट करती है जहां कोर्इ व्यक्ति निम्नलिखित अवस्था में से किसी से ग्रसित है, अर्थात्:–
(i) दृष्टि का पूर्ण अभाव; या
(ii) सुधारक लेंसों के साथ बेहतर नेत्र में दृष्टि की तीक्ष्णता जो 6/60 या 20/200 (स्नेलन) से अधिक न हो; या
(iii) दृष्टि क्षेत्र की सीमा जो 20 डिग्री कोण वाली या उससे बदतर है;
* * *
(झ) "नि:शक्तता" से अभिप्रेत है,–
(i) अन्धता;
(ii) कम दृष्टि;
(iii) कुष्ठ रोग मुक्त;
(iv) श्रवण शक्ति का ह्रास;
(v) चलन नि:शक्तता;
(vi) मानसिक मंदता;
(vii) मानसिक रुग्णता;
* * *
(ठ) "श्रवण शक्ति का ह्रास" से अभिप्रेत है संवाद संबंधी रेंज की आवृति में बेहतर कर्ण में साठ डेसीबेल या अधिक की हानि;
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(ढ) "कुष्ठ रोग मुक्त व्यक्ति" से कोर्इ ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो कुष्ठ रोग से मुक्त हो गया है किन्तु,–
(i) हाथों या पैरों में संवेदना की कमी और नेत्र और पलक में संवेदना की कमी और आंशिक घात से ग्रस्त है किन्तु प्रकट विरूपता से ग्रस्त नहीं है;
(ii) प्रकट विरूपता और आंशिक घात से ग्रस्त है, किन्तु उसके हाथों और पैरों में पर्याप्त गतिशीलता है, जिससे वह सामान्य आर्थिक क्रियाकलाप कर सकता है;
(iii) अत्यन्त शारीरिक विरूपता और अधिक वृद्धावस्था से ग्रस्त है जो कोर्इ भी लाभपूर्ण उपजीविका चलाने से रोकती है,
और "कुष्ठ रोग मुक्त" पद का अर्थ तदनुसार लगाया जाएगा;
(ण) "चलन नि:शक्तता" से हड्डियों, जोड़ों या मांसपेशियों की कोर्इ ऐसी नि:शक्तता अभिप्रेत है, जिससे अंगों की गति में प्रर्याप्त निबंधन या किसी प्रकार का प्रमस्तिष्क घात हो;
(त) "चिकित्सा प्राधिकारी" से कोर्इ ऐसा अस्पताल या संस्था अभिप्रेत है जो समुचित सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए विनिर्दिष्ट की जाए;
(थ) "मानसिक रुग्णता" से मानसिक मंदता से भिन्न कोर्इ मानसिक विकार अभिप्रेत है;
(द) "मानसिक मंदता" से अभिप्रेत है, किसी व्यक्ति के चित्त की अवरुद्ध या अपूर्ण विकास की अवस्था, जो विशेष रूप से बुद्धि की अवसामान्यता द्वारा अभिलक्षित होती है;
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(न) "नि:शक्त व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी चिकित्सा प्राधिकारी द्वारा प्रमाणित किसी नि:शक्तता के कम से कम चालीस प्रतिशत से ग्रस्त है;
(प) "कम दृष्टि वाला व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसकी उपचार या मानक अपवर्तनीय संशोधन के पश्चात् भी दृष्टि क्षमता का ह्रास हो गया है किन्तु जो समुचित सहायक युक्ति से किसी कार्य की योजना या निष्पादन के लिए दृष्टि का उपयोग करता है या उपयोग करने में संभाव्य रूप से समर्थ है;
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(ब) "पुनर्वास" ऐसी प्रक्रिया के प्रति निर्देश करता है जिसका उद्देश्य नि:शक्त व्यक्तियों को उनका सर्वोत्तम शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक, मानसिक या सामाजिक कृत्यकारी स्तर प्राप्त करने में और उसे बनाए रखने में समर्थ बनाना है;
लोक ऋण अधिनियम, 1944 की धारा 2(2)
परिभाषाएं
2. (1) ** ** **
(2) "सरकारी प्रतिभूति" से–
(क) ऐसी प्रतिभूति अभिप्रेत है जो लोक ऋण लेने के उदे्श्य से सरकार द्वारा सृजित और निर्गमित की गर्इ है और जो निम्नलिखित रूपों में से किसी रूप में है, अर्थात् :–
(i) बैंक की बहियों में रजिस्ट्रीकरण द्वारा अंतरणीय स्टाक; या
(ii) आदेशानुसार देय बचन पत्र; या
(iii) वाहक को देय वाहक बंधपत्र; या
(iv) इस निमित्त विहित प्ररूप;
(ख) ऐसे प्ररूप में और इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ, जो विहित किए जाएं, सरकार द्वारा सृजित या निर्गमित कोर्इ अन्य प्रतिभूति;
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (पारस्परिक निधियां) विनियम, 1996 का विनियम 2(डड)
परिभाषाएं
2. (1) इन विनियमों में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,–
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(डड) "समूह" से एकाधिकार और निर्बंधित व्यापार पद्धति अधिनियम, 1969 (1969 का 54) की धारा 2 के खंड (ड़च) में यथा परिभाषित समूह अभिप्रेत है;
प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 की धारा 2 का खंड (ख) (च) और (ज)
परिभाषाएं
2. (1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, &
(ख) "सरकारी प्रतिभूति" से ऐसी प्रतिभूति अभिप्रेत है जो लोक ऋण लेने के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् सृजित और निर्गमित की गर्इ है और जो लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) की धारा 2 के खंड (2) में विनिर्दिष्ट रूपों में से किसी रूप की है;
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(च) "मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज" से ऐसा स्टाक एक्सचेंज अभिप्रेत है जो तत्समय केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 4 के अधीन मान्यताप्राप्त है;
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(ज) "प्रतिभूति" के अन्तर्गत, &
(i) किसी निगमित कम्पनी या अन्य निगमित निकाय में या उसके शेयर, स्क्रिप स्टाक, बन्धपत्र, डिबेंचर, डिबेंचर स्टॉक या इसी प्रकार की अन्य विपण्य प्रतिभूतियां हैं;
(iक) व्युत्पन्न है;
(iख) ऐसी यूनिटें या कोर्इ अन्य लिखत है जो किसी सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा ऐसी स्कीमों के विनिधानकर्ताओं को जारी की गर्इ है;
(iग) वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 की धारा 2 के खंड (यछ) में यथापरिभाषित प्रतिभूति रसीदें;
(iघ) किसी पारस्परिक निधि स्कीम के अधीन विनिधानकर्ताओं को जारी की गर्इ यूनिटें या कोर्इ अन्य लिखत है।
स्पष्टीकरण - शंकाओं को दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि "प्रतिभूतियों" के अंतर्गत ऐसी कोर्इ यूनिट सहबद्ध बीमा पालिसी या स्क्रिप या कोर्इ ऐसी लिखत या यूनिट चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, नहीं आती जिसमें व्यक्तियों के जीवन पर तथा ऐसे व्यक्तियों द्वारा विनिधान पर सामूहिक फायदा जोखिम का उपबंध है और जो बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 2 के खंड (9) में निर्दिष्ट किसी बीमाकर्ता द्वारा जारी की गर्इ है ;
(iड़) ऐसे किसी निर्गमनकर्ता द्वारा, जो विशेष प्रयोजन वाला सुभिन्न अस्तित्व है, जिसके पास ऐसे अस्तित्व को समनुदेशित बंधक ऋण सहित कोर्इ ऋण या प्राप्य राशियां हैं, और जो बंधक ऋण सहित, यथास्थिति, ऐसे ऋण या प्राप्य राशियों में ऐसे विनिधानकर्ता के फायदाप्रद हित को अभिस्वीकार करता है, किसी विनिधानकर्ता को जारी किया गया कोर्इ प्रमाणपत्र या लिखत है (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो;)
(ii) सरकारी प्रतिभूतियां हैं;
(iiक) ऐसी अन्य लिखतें हैं जो केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रतिभूतिघोषित की जाएं; और
(iii) प्रतिभूतियों में अधिकार या हित है।

